
लक्षण
साइटिका की पहचान इसकी विशिष्ट राह से होती है:
- कमर या कूल्हे से आरंभ होकर जाँघ के पीछे, पिंडली व पंजे तक जाती टीस
- प्रायः एक ही पैर में — दोनों में कम
- बैठने, विशेषकर सख़्त सतह पर, दर्द का बढ़ना
- खाँसने-छींकने पर पैर में झटका-सा लगना
- पैर या पंजे में झुनझुनी, सुन्नपन या जलन
- कभी-कभी पंजा उठाने में कमज़ोरी
दोनों पैरों में कमज़ोरी, जाँघों के भीतरी भाग का सुन्न होना, या मल-मूत्र पर नियंत्रण जाना — यह आपातकाल है, तुरंत अस्पताल जाएँ।
आरोग्यम् में उपचार कैसे होता है
सबसे पहले यह देखा जाता है कि नस कहाँ दब रही है — रीढ़ में (स्लिप डिस्क) या कूल्हे की मांसपेशी में। उपचार इसी के अनुसार बदलता है, और यही अंतर परिणाम तय करता है।
इलेक्ट्रो-एक्यूपंक्चर
कमर, कूल्हे व पैर के मार्ग पर बिंदु चुनकर सूइयाँ लगाई जाती हैं और अत्यंत हल्का विद्युत-प्रवाह दिया जाता है — जिससे नस के मार्ग की ऐंठन व सूजन घटती है।
एक्यूप्रेशर
कूल्हे की गहरी मांसपेशियों पर दबाव — विशेषकर जब कारण पिरिफ़ॉर्मिस का कड़ापन हो।
योग चिकित्सा
कूल्हे व जाँघ के पीछे की मांसपेशियों के लिए सावधानीपूर्वक चुने गए अभ्यास। स्लिप डिस्क से उत्पन्न साइटिका में आगे झुकने वाले आसन टाले जाते हैं।
बैठने की आदतें
पीछे की जेब में बटुआ रखकर बैठना, बहुत नरम सोफ़ा, तथा एक ही मुद्रा में घंटों बैठना — तीनों साइटिका बढ़ाते हैं। इन्हें बदलना उपचार का भाग है।
उपचार में प्रयुक्त पद्धतियाँ
